शख्सियत
"अब क्या बताएं हाल बिखर जाने के बाद
और कोई दर न मिला तेरे कासाने के बाद
मुद्दतों हमने हर शख्स में तुमको निहाँ देखा
साकिये ने यूँ पिलाया तुमसे दूर जाने के बाद
आज फिर से मैकदे में दीवानों का है मुशायरा
कुछ शेर हमने भी कहे हर एक पैमाने के बाद
उसके तकल्लुफ का अब क्या कहुँ 'सलीम'
मेहमाँ बनाया मुझको घर मेरा जलाने के बाद
किस्से इन शहर में मेरे भी कुछ मशहूर हुए
वो नाम लेते हैं मेरा जलते परवाने के बाद
तूने इन आंखों से कुछ यूं पिलाया था मुझे
जो उतरती हीं नहीं एक जाम लगाने के बाद
अब कौन चलता है इन रास्तों पर 'सलीम'
जिन्हें देखो तन्हाइयां मिली दिल लगाने के बाद
आजकल दिखती नही आईने में सूरत अपनी
कुछ शख्सियत हीं न रही आप को गंवाने के बाद."
- मनीष कुमार झा "सलीम हिन्दवी'
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