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Showing posts from 2018

तनहाइयाँ

"रातों को अक्सर यूँ जगाया न करो मेरी तन्हाई को और बढ़ाया न करो तेरी बेनियाज़ी पे जान जाएगी मेरी अपनी बेरुखी को यूँ नुमायाँ न करो तेरी चाहत ही मेरी आखिरी उम्मीद है इस तवक्को को यूँ ही ज़ाया न करो हर कोई ओढ़े है यहां तबस्सुम के पैरहन उनकी मुस्कान पे तुम भरमाया न करो कोई सादिक़ नहीं इस जमाने में 'सलीम' हर एक को हर्फ़-ए-दिल सुनाया न करो." -मनीष कुमार झा 'सलीम हिन्दवी'

शख्सियत

" अब क्या बताएं हाल बिखर जाने के बाद और कोई दर न मिला तेरे कासाने के बाद मुद्दतों हमने हर शख्स में तुमको निहाँ देखा साकिये ने यूँ पिलाया तुमसे दूर जाने के बाद आज फिर से मैकदे में दीवानों का है मुशायरा कुछ शेर हमने भी कहे हर एक पैमाने के बाद उसके तकल्लुफ का अब क्या कहुँ 'सलीम' मेहमाँ बनाया मुझको घर मेरा जलाने के बाद किस्से इन शहर में मेरे भी कुछ मशहूर हुए वो नाम लेते हैं मेरा जलते परवाने के बाद तूने इन आंखों से कुछ यूं पिलाया था मुझे जो उतरती हीं नहीं एक जाम लगाने के बाद अब कौन चलता है इन रास्तों पर 'सलीम' जिन्हें देखो तन्हाइयां मिली दिल लगाने के बाद आजकल दिखती नही आईने में सूरत अपनी कुछ शख्सियत हीं न रही आप को गंवाने के बाद." - मनीष कुमार झा "सलीम हिन्दवी'

मृत्यु से अभय

      एक युवा सन्यासी था. उस पर एक राजकुमारी मोहित हो गयी. राजा को पता चला तो उसने सन्यासी से राजकुमारी के साथ विवाह करने को कहा. सन्यासी बोला, "मैं तो हूँ ही नहीं, विवाह कौन करेगा?' सन्यासी की बात सुनकर राजा ने अपने को बड़ा अपमानित महसूस किया. उसने अपने मंत्री को आदेश दिया की उसे तलवार से मार दिया जाय.      सन्यासी उसके आदेश पर बोला, "शरीर  के साथ मेरा शुरू से ही कोई सम्बन्ध नहीं रहा है. जो अलग ही है , आपकी तलवार उसे और क्या अलग करेगी? मैं तैयार हूँ और आप जिसे मेरा सर कहते हैं उसे काटने के लिए उसी प्रकार आमंत्रित करता हूँ, जैसे वसंत की यह वायु पेड़ों से उनके फूलों को गिरा रही है."     वह मौसम सचमुच वसंत का था और पेड़ों से फूल गिर रहे थे. राजा ने उन फूलों को देख और देखा मौत के सामने उपस्थित जानते हुए भी उस सन्यासी की आनंदित आँखों को. उसने एक क्षण सोचा, "जो मृत्यु से भयभीत नहीं है , जो मृत्यु को भी जीवन की भांति स्वीकार करता है उसे मारना व्यर्थ है. उसे तो मृत्यु भी नहीं मार सकती."     राजा ने अपना आदेश तुरंत वापस ले लिया.

स्वयं से मुक्ति

"बुधत्व कभी भी समय या स्थान में नहीं घटता. कब और कहाँ तो समय और स्थान हैं. यह तो तब घटता है, जब तुम कहीं भी नहीं होते, कुछ भी नहीं होते. वह तो समय के पार शाश्वतता में घटता  है. पश्चिम के सभी बुद्धीजीवी जेन में अत्यधिक दिलचस्पी लेने लगे हैं, लेकिन उनकी रूचि बुद्धिगत ही है. उन्होंने जेन पर महान पुस्तकें लिखी हैं. जबकि जेन, बुद्धि का कोई कार्य व्यापार न होकर अमन की शून्यता है. वह है सर्वोच्च लिखावट. मैं जेन को सारभूत रूप से, स्वयं से मुक्त होना कहता हूँ. तुमने दूसरी मुक्तियों के बारे में सुना होगा, लेकिन स्वयं से मुक्त होना ही अंतिम मुक्ति है. कुछ न होते हुए, अस्तित्व को स्वयं अपनी सहजता और अपने सारे सौंदर्य के साथ अभिव्यक्त होने की अनुमति देना, लेकिन यह न तुम हो और न मैं हूँ , यह है - स्वयं अस्तित्व. यह स्वयं नृत्य करता हुआ पूरा जीवन ही अस्तित्व है. यही है जेन की घोषणा और उद्देश्य, स्वयं अपने से ही मुक्ति."